मैं दवा पूछते फिरता था जमाने भर से
भर गए जख्म तेरे हाथ लगाने भर से
बाद मुद्दत के बड़े चैन से सोया था मैं
उड़ गई नींद तेरे ख्वाब में आने भर से
छोड़ आया हूँ दुआओं के भी दरवाज़े मैं,
कुछ नहीं मिलता यहां सिर्फ़ हाथ फैलाने भर से।
जो जला करते थे दीपक तेरे नामों पे कभी,
अब उजाले भी कतराते हैं वहाँ जाने भर से।
तेरा सजदा किया लेकिन मिला कुछ भी नहीं,
अब तो डर लगता है अपना सिर झुकाने भर से।
बात अब इश्क़ की क्या, रूह भी ख़ामोश है,
दिल थक गया है हर रोज़ समझाने भर से।
Explanation
Stanza 1
शायर अपनी ज़िंदगी की तकलीफ़ों का इलाज ढूंढता फिर रहा था, लेकिन जब उसे अपने महबूब का एक स्पर्श मिला, तो सारे ज़ख्म भर गए—यानी उसका प्यार ही सबसे बड़ी राहत था। लेकिन यही प्रेम अब तकलीफ़ बन गया है। लंबे समय बाद उसे थोड़ी राहत की नींद नसीब हुई थी, पर जैसे ही महबूब ख्वाब में आया, नींद छिन गई।
भाव: इश्क़ में राहत भी है और बेचैनी भी। जो कभी मरहम था, वही अब बेचैनी की वजह बन गया है।
Stanza 2
शायर अब दुआ भी नहीं करता, क्योंकि केवल माँगने से कुछ नहीं मिलता—चाहे वो प्रेम हो या सुकून। जिन जगहों पर पहले महबूब के नाम के दीप जलते थे, यानी जहाँ प्रेम की रौशनी थी, अब वहाँ अंधकार है; उजाले तक डरते हैं वहाँ जाने से।
भाव: प्रेम में मिली निराशा ने विश्वास, श्रद्धा और उम्मीद—सब छीन ली हैं। अब दुआएं भी बेअसर हैं, और उजाले भी दूरी बना चुके हैं।
Stanza 3
शायर कहता है कि उसने प्रेम को पूजा की तरह अपनाया, लेकिन फिर भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। अब किसी के आगे सिर झुकाने से भी डर लगता है, क्योंकि वो डरता है फिर टूटने से। अब इश्क़ की बात करना भी बेकार लगने लगा है, क्योंकि उसकी आत्मा तक थक चुकी है, और उसका दिल हर रोज़ खुद को बहलाते-बहलाते थक गया है।
भाव: प्रेम ने उसे इतना तोड़ा है कि अब उसके अंदर की रूह भी खामोश हो गई है। वो पूरी तरह थक चुका है—शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से।
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