“तुम, मैं और थोड़ा सा ब्रह्मांड”

कभी-कभी लगता है तुम ग्रहों की हो मेहमान,
जो भूल गई रास्ता, उतर आई इंसान।
वरना इतनी मासूमियत और शरारत का संगम,
कैसे हो सकता है इतना उत्तम सी कंगन?

मैंने तो सीखी थी बस चाय की फुहार,
तुम आईं तो सोचने लगा पूरा संसार।
कभी हँसी तुम्हारी लगती है रोशनी की चाल,
जैसे सितारों ने छेड़ दी हो कोई सुरमयी ताल। 🌠

कभी सोचता हूँ aliens आएँ जब पास,
कह दूँगा — “भाई, पहले वो कर चुकी है प्रयास।”
क्योंकि जो समझ न आए पर अच्छा लगे नाम,
वो या तो कला है… या तुम्हारा ही काम। 😄💫


कविता “तुम, मैं और थोड़ा सा ब्रह्मांड” का भावार्थ

लेखक ‘रुखानी’ इस कविता में कल्पनाशीलता और कोमल हास्य के माध्यम से अपने गहरे भाव व्यक्त करते हैं।
पहले भाग में कवि उस व्यक्ति की तुलना किसी दूसरे ग्रह की निवासी से करता है —
यह रूपक उस व्यक्ति की अनोख़ी और अलौकिक छवि को दिखाता है।

दूसरे भाग में कवि बताता है कि उस व्यक्ति के आने से उसके जीवन में नयापन और चमक आ गई है।
हँसी, बातचीत और सोच — सब कुछ अब एक “ब्रह्मांडीय अनुभव” बन चुका है।
यह भाव कवि की उत्साहित मानसिक स्थिति और निर्मल स्नेह को प्रकट करता है।


अंत में कवि यह कहता है कि जो व्यक्ति समझ में न आए,
पर उसकी उपस्थिति सुकून दे —
वो कला की तरह है, या शायद उसी व्यक्ति की तरह।
यह अंत कवि की परिपक्व, चुलबुली और रचनात्मक सोच को दर्शाता है,
जो हास्य में छिपे प्रेम की गंभीरता को खूबसूरती से उभारता है। 🌠