आज जब घर की सफ़ाई में मैं धूल के परतों और पुराने जालों को समेट रहा था, तो लगा जैसे हर चीज़, हर कोना, अपनी कोई न कोई कहानी मुझसे कह रहा हो। कहीं अलमारी की दरारों में बीते वर्षों की यादें सोई थीं, तो कहीं दीवारों पर चिपके निशान किसी बीते मौसम की गवाही दे रहे थे।
मुझे लगा — ये घर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, ये भी एक जीवंत प्राणी है, जो हर स्पर्श को याद रखता है।
तभी मेरी नज़र कमरे के कोने में बसी उस मकड़ी पर पड़ी —
जो अपने जाल में जैसे सृष्टि का छोटा सा नक्शा बुन रही थी।
मैंने जैसे ही झाड़न उठाई, वह जाला बिखर गया —
और उस क्षण मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी ने धीमी आवाज़ में पुकारा हो —
“तुम्हारे लिए ये सफ़ाई है, मेरे लिए तो सर्वनाश।”
उसकी नन्ही देह काँप उठी थी,
और मुझे प्रतीत हुआ, जैसे वो कह रही हो —
“तुम्हारे घर में दीये जलेंगे, और मेरा घर बुझ गया।
तुम्हारे बच्चे मिठाई खाएँगे, मेरे बच्चे बिछड़ गए।”
वो स्वर न आँखों से दिखा, न कानों से सुना —
पर भीतर एक कंपन था, जो आत्मा तक उतर गया।
उस क्षण मैंने सोचा —
क्या सच में हम मनुष्य ही इस पृथ्वी के स्वामी हैं?
या फिर हमने बस अधिकारों का एक झूठा साम्राज्य बना लिया है,
जहाँ हर अन्य जीव हमारे ‘सुविधा के नक्शे’ पर मिटा दिया जाता है।
हम अपने त्यौहार मनाते हैं,
पर किसी और के जीवन से उजाला छीन लेते हैं।
हम दीयों में तेल भरते हैं,
पर कितनी नन्हीं ज़िंदगियों की रोशनी बुझा देते हैं —
ये हिसाब कौन रखता है?
कभी-कभी लगता है,
मकड़ी, चिड़िया, चींटी — सबका भी तो एक परिवार, एक संसार होता है।
वो भी डरती हैं, सिमटती हैं, खोती हैं।
पर उनकी चीखें हमारी सभ्यता की आवाज़ में दब जाती हैं।
शायद इसलिए आज वो मकड़ी सिर्फ अपना जाला नहीं खो रही थी,
वो उस दुनिया की भी बात कर रही थी
जहाँ हर बार मानव का उजाला, किसी और का अँधेरा बन जाता है।
3 टिप्पणियाँ
🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟ye mera feedback hai .
जवाब देंहटाएंMeri aap se gujarish hai ki agla vloge mitrata na ke topic pe ki jay
मित्रता ?
हटाएंदुखद है पर बदलाव है
जवाब देंहटाएं