जैसे ही हम सब एक-दूसरे को ठीक से जानने की शुरुआत ही कर रहे थे, उसी दौरान सर्दियों ने दरवाज़े पर दस्तक दे दी। हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी-बाहर मौसम की, और भीतर वक़्त की। सर्दियाँ अपने साथ एक चेतावनी भी लेकर आई थीं, कि अब 12वीं की परीक्षाएँ बहुत पास हैं, और उनके साथ वह अनकहा डर भी की यह साथ, यह हँसी, यह रोज़ की मुलाक़ातें…परीक्षा के बाद स्मृति बन जाएँगी।
ऐसा लगता था मानो बोर्ड परीक्षाएँ सिर्फ़ किताबों का ही इम्तहान नहीं लेतीं, दिलों का भी लेती हैं। वे फुसफुसा कर कहतीं है,“या तो पढ़ाई में डूब जाओ, या एक-दूसरे के साथ बिताए इन पलो को जी लो… दोनों एक साथ सम्भव नहीं।” और सच्चाई यही थी। कक्षा के हर कोने में यह एहसास फैल गया था कि हमारा साथ अब गिनती के महीनों का मेहमान है। कल तक जो लोग अजनबी थे अब वे दिल के इतने करीब हो गए थे कि बिछड़ने का विचार ही भीतर एक खालीपन सी जगह छोड़ जाता था। कभी-कभी लगता था, नियति कितनी अजीब है जिस दिन दिल किसी को अपना समझने लगता है, उसी दिन वक़्त उसके छूट जाने की भूमिका लिखने लगता है।
स्कूल की गलियों में चलते हुए यह लगता था कि ये दीवारें, ये बेंच, ये हँसी,सब हमारी दोस्ती की छापें सँजो रही हैं। और शायद इसी कारण, हर छोटी बात भारी होने लगी। जब हम सब एक साथ बैठते, हँसते, तो भीतर कहीं एक डर गहरा जाता की क्या यह आख़िरी महीनों की हँसी है? क्या आगे चलकर हम यूँ साथ बैठ भी सकेंगे?12वीं के बाद की दुनिया बहुत बड़ी होने वाली है और हर किसी का रास्ता अलग हो जाना तय है। इसलिए हर दिन एक अनमोल दिन जैसा लगता था। बाते चाहे छोटी हों या बड़ी, उनमें एक अलग चमक होती थी शायद इसलिए कि हम जानते थे कि आने वाले समय में यह सब सिर्फ़ यादों का हिस्सा बन जाएगा। वक़्त कभी-कभी निर्दयी भी होता है। वह पहले लोगों को मिलाता है, फिर उनकी गहरी दोस्ती पनपाता है। फिर दूर होने की कहानी लिखने मे जुट जाता है।
परन्तु लड़को की दोस्ती बहुत आसान और साधारण होती है। सच कहें तो लड़कों में दोस्ती की कोई ठोस परिभाषा नहीं होती। किसी से पूछ लो,“तुम दोनों की दोस्ती कब शुरू हुई?” तो जवाब भी किसी हास्य जैसी सरलता भाव से मिल जाता है। कोई कहेगा “भाई ने गलती से मेरा बिस्कुट खा लिया था, वहीं से दोस्त बन गए।” यार फिर “हम दोनों एक ही पीरियड में बाहर फँसे रह गए थे.. दर्द साझा था, दोस्ती बन गई।” और कोई तो यह भी कह दे “उसने मेरी बोतल से पानी पिया था यार, बस तभी से भाई लगने लगा!” मतलब लड़कों की दोस्ती नदी की धारा जैसी सीधी होती है न कोई गहरी तैयारी, न कोई भावनात्मक प्रस्ताव, बस एक छोटा-सा मज़ाकिया हादसा और जीवनभर का रिश्ता बन गया। शायद इसलिए मेरे लिए दोस्ती हमेशा आसान रही थी।
पर अब पहली बार मन में किसी नई दुनिया को जानने और समझने की ललक उठ रही थी। एक ऐसी दुनिया जिसे मैं दूर से तो देखता था, पर कभी उसके भीतर जाने की हिम्मत नहीं कर पाया। मैंने बहुत बार खुद से पूछा, “क्यों न कोशिश करूँ? क्यों न एक लड़की से भी दोस्ती हो? क्या गलत है इसमें?” ये सवाल किसी शरारत से नहीं, बल्कि एक परिपक्व जिज्ञासा से उठ रहे थे। मुझे लग रहा था कि अगर जीवन को वाकई समझना है, तो आधी दुनिया को सिर्फ़ दूर से देखकर कैसे समझ पाया जाएगा? और अंदर कहीं यह भी चाह थी कि मैं जानूँ- लड़कियों की सोच कैसी होती है? उनकी मुस्कान के पीछे कौन-सा भाव छिपा होता है? उनके दुख की खामोशी, उनकी खुशी की चमक, सबमें कितनी परतें हैं जिन्हें मैं आज तक पढ़ नहीं पाया था।
यही ललक शायद पहली बार मेरे भीतर हिम्मत जगाने लगी। और मन में एक विचार उठने लगा, “किसी लड़की से दोस्ती क्यों न की जाए? दुनिया देखने का नज़रिया शायद यहीं से बदलेगा।” यह विचार छोटा नहीं था। मेरी उम्र, मेरा पुराना स्वभाव और मेरी अनगढ़ शर्म.. सब इसके रास्ते में खड़े थे। पर इच्छा अब जाग चुकी थी। और जब मन किसी नई दिशा की ओर जाग जाए, तो इंसान अपनी सीमाएँ खुद तोड़ने लगता है।
Next पढ़ाई से परे
अब तक मैं हमेशा वही पुराना-ख़यालों वाला लड़का था जिसे लगता था कि जीवन सिर्फ़ पढ़ाई, अनुशासन और जिम्मेदारियों में ही सिमट जाना चाहिए। लड़कियों की भावनाएँ, दोस्तियाँ, रिस्ते इन सबको मैंने हमेशा एक दूरी से देखा था, मानो ये सब मेरे हिस्से की चीज़ें न हों। पर शायद बनारस का असर था…शायद वह शहर, जिसकी हर गली जीवन को नए अर्थ में समझाती है, मुझे भी धीरे-धीरे बदल रहा था।और शायद वह एहसास भी कि 12वीं के बाद यह साथ, ये चेहरे, ये पल कभी वापस नहीं आएँगे। हृदय में कहीं एक पुरानी जिद जगाने लगा था कि “क्यों न इस जीवन को थोड़ा जिया जाए? किताबें तो अब तक भी साथ थीं, पर लोग… अलग अलग अनुभावो का संसार संजोये हुए मित्र शायद अब नहीं रहेंगे।”
इसलिए मैंने अपनी सारी हिचकिचाहट, डर, संकोच; सबको एक जगह समेटा। छाती में धड़कते दिल को शांत करने की कोशिश की। और पहली बार, शायद अपनी ज़िंदगी में पहली बार…मैंने सोचा कि ज्ञान के साथ थोड़ी मानवीयता, थोड़ी दोस्ती और थोड़ी मुस्कान भी ज़रूरी होती है। (इतनी हिम्मत आने के पीछे एक कहानी है जो थोड़ी लम्बी है, आगे लिखने का प्रयास करूंगा, मेरे दूसरे रूप मे)। और उसी सोच के साथ मैंने हिम्मत जुटाई। बहुत देर तक , कई दिनों तक खुद से लड़ाई करने के बाद, अपने मन के हजारों तर्कों को शांत करते हुए, आख़िरकार एक क्षण ऐसा आया जब मैंने तय किया कि अब पीछे नहीं हटना। मैंने धीरे से, बहुत सादगी से…एक लड़की को मित्रता का हाथ बढ़ाया। वह क्षण छोटा था, पर मेरे लिए किसी बड़े मोड़ जैसा। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे हृदय की गति प्रकाश की गति से होड़ कर रहा हो, हथेलियाँ हल्की काँप रही थीं, और मन में यही सवाल-“पता नहीं वो क्या सोचेगी… पता नहीं दोस्त क्या सोचेंगे…अगर कक्षा के बाहर बात फैल गयी तो...
मेरे भीतर का वह पुराना, संकोची और शांत लड़का पहली बार अपने ही बनाए दायरों से बाहर कदम रख रहा था।
और जब मैंने कहा; “हम दोस्त बन सकते हैं…?”
तो ऐसा लगा जैसे जीवन से पहली बार मुझे खुद को जीने की अनुमति मांग रहा हुँ ।
मैंने सिर्फ़ एक सरल-सा मित्रता का हाथ बढ़ाया था, पर मन के भीतर जाने कितने समुद्र एक साथ मचलने लगे। किसी ने मुझे कभी नहीं सिखाया था कि एक लड़की से दोस्ती कैसे निभाई जाती है। कैसे उसके सामने अपने शब्दों को संतुलित रखा जाता है…कैसे उसके भावों को समझा जाता है…और कैसे यह सुनिश्चित किया जाता है कि सामने वाला तुम्हें गलत अर्थों में न ले ले।
मुझे लगता है, किसी लड़की से दोस्ती करना तो बिल्कुल सामान्य बात होनी चाहिए, पर हमारी दुनिया (केवल भारतीय समाज) कितनी जल्दबाज़ है हर रिश्ते को किसी और साँचें में ढाल देने में। मैंने सिर्फ़ संवाद का दरवाज़ा खोला था, पर मन भीतर पूछ रहा था की अगर उसे लगा कि मैं उसे गलत समझ रहा हूँ? या अन्य कोई उसके बारे में कुछ कहने लगे तो क्या यह हाथ बढ़ाना एक भूल बन जाएगा?” ये सब सवाल बवंडर की तरह थे। मेरे दोस्त जिज्ञासा और कुछ मजाक भारी नजारों से देख रहे थे फिर भी बहार की दुनिया शांत लग रही थी पर भीतर का मन जैसे किसी गहरे युद्धभूमि पर खड़ा था। और यह बात मुझे और परेशान करती थी कि मैं किसी गलत इरादे से नहीं आया था। मेरे मन में न कोई छल था, न कोई प्रलोभन सिर्फ़ एक साधारण, विनम्र-सी इच्छा कि एक इंसान के रूप में किसी दूसरे इंसान को समझा जाए।
पर क्या दुनिया इतनी सीधी होती है? क्या भावनाओं के बीच शक की परछाइयाँ नहीं पड़तीं? क्या रिश्तों को बिना डर, बिना संदेह सिर्फ़ सहजता के साथ अपनाया जा सकता है? मैं उलझन में था; उस झिझक और साहस के बीच जो हर लड़के के भीतर एक साथ पलते हैं। एक ओर उत्सुकता थी कि इस नए संवाद के रास्ते पर आगे क्या मिलेगा। दूसरी ओर डर और समाज की अनियंत्रित जिह्वा तीसरी दिशा में हवाओं की तरह बहती रहती है।
मुझे यह समझ आने लगा था कि किसी लड़की की ओर बढ़ाया गया हाथ सिर्फ़ हाथ नहीं होता, उसके साथ समाज की तमाम नज़रें जुड़ जाती हैं, तमाम अपेक्षाएँ, तमाम गलतफ़हमियाँ और उन सबके बीच अपने विचारों और स्वभाव मे उसके प्रति परिवर्तन लाना सबसे कठिन गृहयुद्ध होता है। वह समाज की हजारों धारणाओं से टकराता हुआ अभिप्राय, मर्यादा और चरित्र की एक त्रिकूट परीक्षा बन गया था।

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