सौदा" हमारा कभी "बाज़ार" तक नही पहुंचा, 

"इश्क" था जो कभी "इज़हार" तक नहीं पहुंचा

यूँ तो "गुफ्तगू" बहुत हुई उनसे मेरी, 

"सिलसिला" कभी ये "प्यार" तक नहीं पहुंचा...!


हमने तो बाँध दीं थीं साँसों से उनकी धड़कनें,

था ख्वाब सा कुछ, जो "ख़रीदार" तक नहीं पहुंचा।

वो अश्क जो पलकों से कब के बह चुके थे,

उनकी खबर भी किसी "अख़बार" तक नहीं पहुंचा।


मैंने "सितारों" से भी की थी उसकी ताज्जुब में बात,

शायद वो रौशनी "अंधकार" तक नहीं पहुंचा।

लब पे तस्लीम थी, पर रूह में थी बग़ावत,

ये हाल मेरा कभी "इनकार" तक नहीं पहुंचा।


मैंने जो फूल सी बातों में आग छिपाई थी,

वो जलन भी किसी "अस्वीकार" तक नहीं पहुंचा।

कहते हैं इश्क़ में इक दीवाना काफी है,

फिर भी मेरा जुनून "सरकार" तक नहीं पहुंचा।


                      Explanation 


Stanza 1

कवि इस पद्यांश में यह कहना चाहता है कि जिस प्रकार कोई सौदा तभी सफल होता है जब वह बाजार तक पहुँचता है, उसी प्रकार प्रेम भी तभी पूर्ण होता है जब उसका इज़हार हो।

उन्होंने तो कई बार बात की, संवाद हुआ — पर वे उस हिम्मत तक नहीं पहुंच पाए जहाँ यह कहना चाहिए था कि "मैं तुमसे प्यार करता हूँ।"

अफसोस इस बात का है कि अवसर था, भावनाएँ थीं — पर व्यक्त नहीं हो सका।


Stanza 2

कवि इस पद्यांश में यह कहना चाहते हैं कि उनका प्रेम अत्यंत गहरा था — जैसे किसी की धड़कनों से अपनी साँसें जोड़ लेना।

मगर उस प्रेम की कीमत किसी ने समझी ही नहीं — जैसे कोई ख्वाब जो बाज़ार में बिके ही नहीं।

वे अकेले रोए, टूटे — लेकिन किसी को यह खबर तक न लगी।

यहाँ कवि अपनी खामोश पीड़ा को दर्शाते हैं — जो दिल में रह गई, दुनिया तक न पहुंची।


Stanza 3

कवि कहना चाहता है कि उन्होंने प्रेमिका की सुंदरता और आकर्षण के बारे में चुपचाप सितारों से भी बातें कीं — मानो एक अलौकिक रहस्य हो।

मगर उस उजाले की किरणें उस अंधेरे तक न पहुँचीं, जहाँ प्रेमिका के दिल में कोई कोना शायद उनके लिए बना होता।

उन्होंने ऊपर से सब स्वीकार कर लिया — जैसे कोई शिकायत नहीं,

पर भीतर आत्मा रोती रही, संघर्ष करती रही — पर ये बगावत इतनी मौन रही कि कोई ‘ना’ तक नहीं कह सका।

यहाँ एकदम सधा हुआ, नियंत्रित दर्द है — जो कहना चाहता था, पर बस रह गया।


Stanza 4

कवि बताना चाहते हैं कि उन्होंने अपनी पीड़ा को शब्दों में कोमलता के साथ रखा — जैसे फूलों में आग भर दी हो।

मगर सामने वाले ने उस ताप को महसूस तक नहीं किया, न ही स्वीकार किया और न ही ठुकराया।

इश्क़ को निभाने के लिए एक दीवाना काफ़ी होता है — ये तो दुनिया भी मानती है,

मगर उनका जुनून, उनकी दीवानगी इतनी अदृश्य रह गई कि जिससे असर होता, वहाँ तक पहुँची ही नहीं।

यहाँ कवि अपनी अनदेखी की पीड़ा को चुपचाप झेल रहे हैं

 — जैसे कोई चिट्ठी जो डाकघर में ही रह गई।