यह उसकी मेहरबानी है कि वो घर में ही सावर्ती है,

निकल आए अगर जो महफ़िल में, तो क़त्लेआम हो जाए।

नज़रों से बचाए फिरते हैं उसको परदे हर रुख़ के,

हवा छू ले जो ज़ुल्फें उसकी, तो इल्ज़ाम हो जाए।



वो हँसे तो दिलों की धड़कनें भी बेहोश हों जाएँ,

और रो पड़े तो मौसम भी बरसों ग़मगीन शाम हो जाए।

हया ओ पर्दा छोड़ दे जो, उस नज़ाकत की मलिका,

तो इक नज़्म नहीं, हर नज़ारा कलाम हो जाए।


नज़ीरें थम जाएँ, महफिल रुक जाए, दिल सबका काँपे,

वो जब चले मुस्कुराकर, तो क़यामत आम हो जाए।

वो आँखें झुका ले अगर तो इबादत सी लगती हैं,

उठ जाए गर नज़रे तो सीधा सलाम हो जाए।


                           Explanation 

Stanza 1

इस हिस्से में उस स्त्री की सुंदरता और आकर्षण की तीव्रता को दर्शाया गया है।

कवि कहता है कि उसका घर में रहना लोगों के लिए एक रहमत है क्योंकि अगर वो बाहर निकल गई, तो उसकी खूबसूरती से दीवाने लोग आपा खो बैठेंगे — वहाँ प्रेम नहीं, जुनून और पागलपन का "क़त्लेआम" मच जाएगा।

उसकी सुंदरता इतनी प्रभावशाली है कि हर कोना, हर दिशा जैसे उसे परदों में छुपाए रखना चाहती है। हवा तक अगर उसके बालों को छू ले, तो लोग उसे भी दोष देने लगें — इतनी नाज़ुक और लाजवाब है उसकी शख़्सियत।


Stanza 2

इस हिस्से में उस नायिका की भावनाओं का असर बताया गया है।

उसकी मुस्कान इतनी असरदार है कि उसे देख दिलों की धड़कनें रुक जाएँ — जैसे मोहब्बत का करंट दौड़ जाए। और अगर वह रो दे, तो सिर्फ लोग ही नहीं, पूरा मौसम भी उसकी उदासी में डूब जाए — हर तरफ ग़म का आलम छा जाए।

अगर वह अपनी शर्म और पर्दे को त्याग दे, खुलकर सामने आ जाए, तो उसकी नजाकत से भरी मौजूदगी से हर दृश्य कविता बन जाए — हर चीज़ में सौंदर्य का संगीत गूंजने लगे।


Stanza 3

यहाँ उस स्त्री के चलने, मुस्कुराने और नज़रों के जादू को दर्शाया गया है।

वो जब हल्की सी मुस्कराहट के साथ चलती है, तो जैसे पूरी महफ़िल स्तब्ध हो जाती है, सबकी निगाहें ठहर जाती हैं — लोग काँपने लगते हैं — जैसे क़यामत का नज़ारा उतर आया हो।

उसकी आँखें जब झुकती हैं, तो वो दृश्य पूजा जैसी पवित्रता का अनुभव देता है। लेकिन अगर वो नजरें उठाकर देखे — तो लोग उसे देख सलाम ठोकें, उसकी मोहब्बत में झुक जाएँ।