तसल्ली से पढ़ते तो समझ आते हम,

बिना पढ़े कुछ पन्ने पलट दिए तुमने...

हर लफ़्ज़ में था दर्द छुपा गहरा,

मगर यूँ ही नज़रें बदल दिए तुमने।


हम खामोश थे, पर कहानी थी सारी,

हर साँस में बस थी यादें तुम्हारी...

तुम ढूँढते रहे शोर में मतलब,

चुप्पियों में हमने सदा दी पुकारी।


हर मोड़ पे इक शक्ल थी रूबरू,

हर राह में थी इक खुशबू सी तू...

पर तुमने उन नक़्शों को मिटा डाला,

जिनमें छुपा था मेरा जुस्तजू।


कुछ ख़्वाब थे जो सिसकते रहे,

कुछ आँसू किताबों में रिसते रहे...

तुमने बस ज़ाहिर को ही देखा,

अंदर के मौसम तो बस थमते रहे।


                          Explanation 


Stanza 1

कवि कहता है कि अगर तुमने मुझे धैर्यपूर्वक समझने की कोशिश की होती, तो मेरी भावनाओं की गहराई तक पहुँच सकते थे। लेकिन तुमने तो मेरी ज़िन्दगी (या रिश्ते) की किताब को ऐसे ही उल्टा-पल्टा और आगे बढ़ गए। हर बात में कोई न कोई पीड़ा छिपी थी, पर तुमने अनदेखा कर दिया।


Stanza 2

यहाँ कवि कह रहा है कि वह बाहर से भले शांत था, पर अंदर एक पूरी कहानी, एक भावनाओं का समुंदर था — जिसमें सिर्फ उसी एक व्यक्ति की यादें थीं। लेकिन वह व्यक्ति सिर्फ ऊपरी बातें या "शोर" में अर्थ खोजता रहा, जबकि कवि की खामोशी में भी पुकार छिपी थी जिसे न सुना गया।


Stanza 3

हर रास्ता, हर मोड़, हर याद — सब जगह उस प्रेमिका (या प्रेमी) की मौजूदगी थी, एक तरह से उसकी खुशबू सी फैली थी ज़िंदगी में। लेकिन उसने उन यादों को, उन इशारों को मिटा दिया, जिन्हें कवि ने इश्क़ की तलाश (जुस्तजू) में सहेज कर रखा था।


Stanza 4

कुछ अधूरे सपने थे जो टूटते गए और चुपचाप सिसकते रहे। कवि के आंसू उसकी ज़िन्दगी की किताब में रिसते रहे यानी वह चुपचाप दुख झेलता रहा। लेकिन सामने वाले ने बस बाहरी हावभाव को देखा, अंदर के गहरे दुख, जज़्बात, और "मौसम" — वो समझ नहीं पाया।


Stanza 5

यहाँ कवि दुख जताता है कि उसे सिर्फ एक शरीर के तौर पर देखा गया, उसकी आत्मा, भावनाएं, और सच्चे जज़्बात कभी समझे ही नहीं गए। अगर कभी सामने वाला उसके दिल की बातों को गहराई से पढ़ता, तो ये प्रेमकहानी अधूरी या अजनबी सी न रह जाती।