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हॉस्टल के नियम सख़्त थे, बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। दीवारें ऊँची थीं, जैसे किसी अनुशासन की परिधि में कैद जीवन। पर शायद बनारस को यह बंधन स्वीकार न था। यह शहर जैसे हर पल मुझे पुकारता था, अपनी प्राचीन साँसों, अपने रहस्यमय गलियारों और अपनी अनकही कथाओं के साथ। कभी-कभी, सप्ताह में एक-दो दिन की छुट्टी मिलती तो मैं और मेरे कुछ साथी उन दीवारों के परे निकल पड़ते बिना किसी निश्चित गंतव्य के। बस शहर को देखने, महसूस करने, और उसके मौन में छिपी कविता को सुनने के लिए। ऐसा प्रतीत होता था मानो यह नगर स्वयं अपने सौंदर्य की व्याख्या कर रहा हो, किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए। उसकी गलियाँ मानो किसी बुज़ुर्ग कवि की तरह थीं थकी हुई पर अनुभवों से भरी। हर मोड़, हर मंदिर, हर घाट अपने भीतर कुछ कहता था , कुछ ऐसा जो शब्दों से नहीं, केवल अनुभूति से समझा जा सकता था।
हम अक्सर बिना दिशा के चलते रहते पर हर रास्ता किसी अर्थ तक पहुँच जाता। कभी किसी संकरी गली में कोई दीपक टिमटिमाता दिखता, तो लगता वह मेरे भीतर की अंधेरी जगहों को रोशन करने आया हो। कभी गंगा किनारे बैठकर लगता जैसे यह नदी मुझसे संवाद कर रही हो- कि “चलना ही जीवन है, ठहरना केवल अनुभवों को सँभालने का समय।” और सच में, धीरे-धीरे मैं समझने लगा कि इस शहर कि व्याख्या करने के लिए कुछ काल्पनिक लिखने, या कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। यह स्वयं ही अपनी परिभाषा है, अपनी भाषा है, अपनी कविता है। बस उसे देखने की दृष्टि चाहिए और शायद वही दृष्टि मुझमें उस समय जन्म ले रही थी।

1 टिप्पणियाँ
शायद मेरा दृष्टि थोड़ा सा विपरीत रहा बनारस को लेकर। पर कुछ ऐसा ही था
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