BADE SHAHAR KE LOG
जब मैं उन सहपाठियों से रोज मिलने-जुलने लगा जो शुरू से ही इंग्लिश माध्यम में पढ़े थे, तो धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि उनके भीतर चल रहा संघर्ष बिल्कुल अलग किस्म का है।
उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई पर जितना खर्च कर चुके होते हैं, उतना खर्च अक्सर एक साधारण घर महीनों की मेहनत में भी इकट्ठा नहीं कर पाता।
इसलिए उन बच्चों पर बोझ सिर्फ किताबों का नहीं होता; बोझ होता है उम्मीदों का, सपनों का, और उस अदृश्य दबाव का जो समाज हर सुबह उनके कंधों पर लाद देता है।
वे उन्हीं उम्मीदों के सहारे चलते हैं, जिनमें माता-पिता का विश्वास भी छिपा होता है और डर भी कि ‘‘कहीं बच्चा पीछे न रह जाए।’’ इन सब बातों को समझते-समझते एक दिन मेरे मन में एक कविता की तरह एक दृश्य उतर आया :
पीपल ने अपने बेटे से कहा कि चल आम दे,
मैं तो ज्यादा कुछ कर ना पाया अब तू ही मुझे नाम दे।
और जैसे कहेगी ये दुनियादारी, वैसे दूं तुझे खाद पानी,
तुझे कुछ बनाने को लुटा दूं तुझ पर सारी जवानी।
और अब से तू इस गांव चौपाल में नहीं बल्कि
नर्सरी इंग्लिश बाग में रहेगा,
और कोई जो पूछेगा तुझसे नाम तेरा
तो तू अब से खुद को आम कहेगा।
चल अब गला घोट, टाई लगा, फीते कस।
कमर सीधी, भारी बस्ता, पकड़ पीली बस..
और फिर वहां से आना जल्दी खाना खाना जल्दी।
ट्यूशन वाले के पास जाना जल्दी।
क्योंकि फिर मैं तेरी ये दिल जैसी पत्तियां काट
तुझ पर आम की कलम लगाऊंगा ,
और फिर तू रोले मरले चाहे जितना
मै बनाऊंगा...मैं तुझे आम ही बनाऊंगा .
yah kavita sayad instagram pr suna tha . यह कविता पढ़कर ऐसा अहसास होता है ही कि हर इंग्लिश माध्यम का बच्चा “अंग्रेज़ी सीखने” नहीं, बल्कि कभी-कभी अपनी पहचान खोने की कीमत भी चुका रहा है। उनके पिता उसके लिए बुरा नहीं चाहते, वे बस दुनिया की नज़र में अपने बेटे को “काबिल” बनाना चाहते हैं। लेकिन यही चाहत कई बार बच्चों के मन पर अनकहे घाव छोड़ देती है।
उनकी आँखों में मैंने वह थकावट देखी है जो सिर्फ पढ़ाई से नहीं, बल्कि बना दिए जाने के दबाव से आती है। उनकी मुस्कान में मैंने वह टूटन देखी है जिसे वे अपने माता-पिता से भी छुपाते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि उनकी थकान कहीं उनके माँ-बाप की उम्मीदों को चोट न पहुँचा दे।
तभी मुझे पहली बार एहसास हुआ कि भाषा, स्कूल, दिखावट; सब सतही भेद हैं। पर भीतर की लड़ाई, अंदर का डर, और भविष्य की चिंता, ये सब इतनी समान होती हैं कि किसी भी माध्यम की दीवारें इन्हें रोक नहीं सकतीं।
और शायद इसी समझ ने मुझे लोगों की दुनिया को सतह से नहीं, उनके अनुभवों की गहराई से समझना सिखाया। और जब मैं यह सब समझने लगा तो मुझे उन इंग्लिश-मीडियम वाले बच्चों के चेहरे बिल्कुल अलग दिखने लगे। उनकी मुस्कान के पीछे दबा तनाव, उनकी बातचीत के पीछे झलकता प्रतियोगिता का डर, और उनके माता-पिता की उम्मीदों का बोझ।
ये सब किसी एक भाषा से नापे जाने वाली चीज़ें नहीं थीं। तभी मेरे भीतर यह सच और गहराई से उतरा कि दिल का बोझ हर भाषा में बराबर भारी होता है और सपनों की कीमत हर परिवार में उतनी ही चुभती हुई होती है।

0 टिप्पणियाँ