dostiyan
अब तक हमारी बातचीत बस शुरू-सी ही हुई थी। ज्यादातर पढ़ाई की बातें, नोट्स, क्लासवर्क, असाइनमेंट, और परीक्षा का दबाव। हम दोनों ही अपनी-अपनी पढ़ाई में इतने उलझे रहते थे कि बातों की दिशा ज़्यादातर किताबों के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी।
पर जैसे ही पढ़ाई का तनाव बढ़ता, और मन पर बोझ सा महसूस होने लगता, हम थोड़ी देर के लिए किताबों की दुनिया से बाहर निकलकर अपने बारे में बात करने लगते। छोटे-छोटे अनुभव, अपने डर, अपनी उम्मीदें, अपना अतीत, और वो सब बातें जो किसी को तभी बताई जाती हैं जब हृदय धीरे-धीरे किसी को अपना सा मानने लगे।
धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा कि हम दोनों एक-दूसरे को सिर्फ़ सहपाठी की नजर से नहीं, बल्कि इंसान के रूप में समझने लगे हैं।
उसके शब्दों के पीछे की थकान, उसके हँसी के पीछे की संजीदगी, और उसकी चुप्पी के भीतर छिपी कहानी। उसे शायद बहुत जल्दी यह महसूस हो गया था कि मैं बोलने से ज़्यादा सुनना पसंद करता हूँ।
शायद इसी वजह से वह पहले से थोड़ी ज्यादा बोलने लगी थी। हम दोनों के बीच की शुरुआती झिझक धीरे-धीरे पिघलती जा रही थी। अब बातचीत किसी औपचारिकता की तरह नहीं, बल्कि दो व्यक्तित्व के बीच का सहज प्रवाह लगने लगी थी।
इसी सहजता के बीच एक दिन मैंने महिलाओं की आज़ादी पर बात छेड़ी—
बस एक साधारण-सा सवाल,
जैसे कोई हल्की सी गुफ़्तगू हो।
मगर उसके लिए यह सिर्फ़ “विषय” नहीं था;
यह उसके अनुभवों का दरवाज़ा था।
क्योकि इसी दौरान मुझे हमेशा लगता था कि समाज अब पहले से बेहतर हो गया है। लड़कियों को लेकर सोच बदल गयी होगी, स्त्रियों को रूढ़िवाद सोचो से आज़ादी मिल गयी है, और शायद अब उनकी दुनिया उतनी सीमित नहीं रही जितनी पुराने जमाने की कहानियों में दिखती है।
लेकिन जब मैने इस मामले अपना विचार साझा किया था। तब उसका एक नया रूप मेरे सामने उभरने लगा वो भी अपने शब्दों को यूँ बुनकर सामने रखती थी जैसे कोई महीन कारीगर धागों को जोड़ते-जोड़ते अचानक एक पूरी तस्वीर रच दे।
उसकी बातें सिर्फ़ कहानी नहीं होती थीं, उनके भीतर अनुभव का ऐसा ताप था जिससे मैं कई बार अवाक् रह जाता था। उसके शब्दों में एक अजीब-सी परिपक्वता थी। जो उम्र से नहीं, दुनियादारी को बहुत करीब से देखने से आती है।
कभी-कभी तो उसकी लिखी एक-एक बात इतनी गहरी लगती कि मुझे उसके अनुभवों की सीमा पढ़ना मुश्किल हो जाता। वह किन-किन भावनाओं से गुज़री है, किस-किस मोड़ पर किस तरह खड़ी रही है, और किन बातों ने उसे आज इतना संजीदा बना दिया है।
यह सब समझना आसान नहीं था। शायद इसी वजह से वह मुझे हर बीतते दिन के साथ और अच्छी लगने लगी। क्योंकि उसके शब्दों में सिर्फ़ सौंदर्य नहीं था, एक सत्य भी था। और सच में सुंदरता का वही रूप दिल को सबसे ज़्यादा बाँध लेता है।
मेरे समाज को देखने के नजरियो को कुछ इस तरह बदलने लगी की मेरे उम्मीदों के परे था । वो कहती की तुम्हे क्या लगता है ये समाज औरतों को इतनी आसानी से आजादी और संवादो की छुट कैसे दे सकता है उसने अपने वाक्यों को पंक्तियों मे कुछ इस प्रकार पिरो कर कहा की -
परंतु मैंने ऐसा कहा नहीं क्योंकि तभी मुझे विकास दिव्यकीर्ति की बातें याद आ गई वे कहते हैं कि, "जीवन में आप जो कुछ भी है उसमें आपका योगदान लगभग 5% है केवल, बाकी आपके माहौल पर निर्भर करता है।"
अभी मुझे पता नहीं पता था कि उनकी बातें कितनी दार्शनिक होती है परंतु इतना विश्वास था और है कि वे जो भी बोलते हैं तो उनके बातो का मतलब कहीं ना कहीं समाज के विचारधाराओ में अपनी जगह बना लेता है।
तब मुझे फिर लगने लगा कि समाज की ये रूढ़िवादी सोच अभी भी वही खड़ी है बस थोड़ा सा रूप बदल गया है।

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