वह तवायफ़ है — पर उसकी आत्मा किसी शांत नदी जैसी थी, जो बाहर से स्थिर दिखती है, पर भीतर अनगिनत धाराएँ बहती रहती हैं। उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक है, जैसे संध्या के समय सूरज की अंतिम किरणें, जो डूबने से ठीक पहले आकाश को सोने में रंग देती हैं। उसका जीवन भी वैसा ही है। टूटन में भी सौंदर्य, थकान में भी तेजस्विता।
वह जब नाचती, तो लगता है मानो प्रकृति स्वयं लय में झूम रही हो , जैसे हवा में बहते हुए पत्ते, जैसे किसी झरने की छलकती बूँदें, जैसे किसी सूखे वृक्ष पर अचानक आई बयार।
लोग उसकी देह को देखते है, पर एक लेखक ने उसकी चेतना का संगीत सुना। वह प्रेम को देह से नहीं, उससे ऊपर की सोच को प्राथमिकता देती हो।
जैसे मीरा ने कृष्ण को गाया, पर पाया नहीं। उसकी हर मुस्कान, हर नज़र में एक अदृश्य वेदना है, जो उसे साधारण स्त्रियों से असाधारण बनाती थी।
वह प्रेम को गुलाब की तरह नहीं, अग्नि की तरह मानती थी , जो जलाए भी, पर शुद्ध भी करे।
उसकी हँसी किसी मंदिर की घंटी जैसी थी, जिसमें राग भी था और पुकार भी।
वह जानती थी कि समाज उसे कभी ‘पवित्र’ नहीं कहेगा, पर उसे फर्क नहीं पड़ता था , क्योंकि उसने पवित्रता को परिभाषा से नहीं, अनुभव से जिया था।
और शायद इसी लिए लेखक उसके प्रेम में नहीं, उसके अस्तित्व में खो गया , क्योंकि उसमें उसे वह मिला जो हर युग के बाद भी अमर रहता है - सौंदर्य का सत्य, और सत्य का सौंदर्य।
जब मैने उसे थोड़ा और पास से देखा तो लगा जैसे हवा में कोई अनकहा संगीत घुल गया। मैं उसे देखता रहा, पर समझ नहीं पाया कि क्या देख रहा हूँ- सौंदर्य, पीड़ा, या कोई गूढ़ शांति? उसकी आँखों में एक ऐसा ठहराव था, जो भीतर तक उतर जाए। जब वह बोलती, तो शब्दों में कोई जादू नहीं, बस एक अजीब-सी सच्चाई होती जो सीधे हृदय को छू जाती।
उसकी हर हरकत जैसे मुस्कुराना, बालों को कानों के पीछे सरकाना, पायल की धीमी झंकार , सब कुछ इतना जीवंत लगता कि जैसे जीवन खुद उसके चारों ओर नृत्य कर रहा हो। पर मैं उलझा हुआ था यह आकर्षण है, या किसी अनुभव भरा स्नेह की पहचान?
मैं उसके सामने गया तो लगता जैसे कोई दर्पण सामने रख दिया गया हो — जिसमें मैं अपने भीतर की कोमलता देख पा रहा हूँ। वह बोलती तो लगता जैसे वह दुनिया को नहीं, मेरे मौन को पढ़ रही हो।
कभी-कभी सोचता हूँ — शायद मैं उसके भीतर वो देख रहा हूँ, जिसे दुनिया ने देखना छोड़ दिया है। और यही सोच मुझे डरा देती है।
मुझे नहीं पता यह प्रेम है या बस एक गहरी प्रशंसा, पर इतना जानता हूँ — जब वह पास थी तो मेरे भीतर कुछ बदलने लगता है, जैसे कोई ठहरी हुई नदी फिर से बहने लगी हो।

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