एक दिन, ऐसे ही हल्की-सी बातचीत के बीच, मैं अचानक उससे पूछ बैठा,“तुम्हें क्या लगता है… यह बनारस मुझे कैसा लगता है?” यह प्रश्न ऊपर से साधारण ही था जैसे कोई बस मज़ाक-मज़ाक में कुछ पूछ रहा हो। पर मेरे मन के भीतर यह सवाल बहुत गहरी जड़ें रखता था। असल में, मैं जानना चाहता था कि वह मुझे कितनी गहराई से पढ़ पाती है; मैंने यह सवाल सिर्फ़ शहर के बारे में नहीं पूछा था। मैंने असल में पूछा था अपने बारे में। और जब मैंने सवाल पूछा…

कुछ देर के बाद उसने उसने कहा कि रुको मैं एक कविता ढूंढ रही हूं अपने डायरी में। मैं थोड़ा और उत्साहित हो गया क्योंकि जब भी वह कोई कविता सुनती मै उसके शब्दो मे कही खो सा जाता था.

 ये अहसास शब्दो मे बया करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है, एक असीम संतुष्टि का अनुभव होता। 

कहती है -

तुम्हारे  लिए  होगा  घाटों का बनारस
सांढ  सीढी और सन्यासो का बनारस
इश्क  मोहब्बत  फसानो  का  बनारस
अड़      गए     तो     ठाठ     बनारस
नाव    के        नीचे    प्यार   बनारस
सुबह     सवेरे     चाय          बनारस
अल्हड़     पागल     मस्त      बनारस
नशे     में     डूबा    जाय      बनारस
स्थिर    शांत   और   एकांत   बनारस
शामों    में    लस्सी    भांग    बनारस
हम तो खैर मुसाफिर हैं कितना कैद कर आंखों में,
तस्वीरों   में   वो  नहीं   जो   सुकून   है  सासो मे।

मैं उस क्षण इतना परेशान हो गया इतना कि मुझे अपनी ही समझ पर संदेह हो गया। मैंने खुद को रोक नहीं पाया, मेरी बेचैनी, मेरी जिज्ञासा और शायद थोड़ा-सा डर सब मिलकर एक ही सवाल बन गए :

“तुम मेरे बारे में इतना कैसे जान लेती हो?
हमारी बातचीत को तो कुछ महीने ही हुए हैं…”

मेरी आवाज़ में हैरानी थी, और दिल में एक गहरी उलझन जैसे मैंने पहली बार किसी को अपने मन की दीवारों के पार झाँकते हुए पकड़ लिया हो।

वह मुस्कुराई नहीं,
बस गहरी साँस लेकर बोली :

“क्योंकि मैंने बहुत वक़्त दिया है किसी को…
इतना वक़्त कि मेरी पढ़ाई भी पीछे रह गई।
मेरी गलती यह नहीं थी कि मैंने उसे चाहा…
गलती यह थी कि मैंने ‘उसे’
अपने सपनों से ज़्यादा चाह लिया।”

और फिर उसने धीमे स्वर में
अपने जीवन की सबसे भारी बात कही...

“पर जीवन का सबक कभी बेकार नहीं होता…
तजुर्बे इंसान को चीज़ों से नहीं, लोगों से नहीं ख़ुद से मिलवाते हैं।
इसलिए आज मैं लोगों को जल्दी पहचान लेती हूँ।”

उस पल मैं बिल्कुल स्तब्ध रह गया। जैसे अचानक मुझे एहसास हुआ कि जिस उम्र में मैं अभी दुनिया को समझने की कोशिश ही कर रहा था, उस उम्र में वह दर्द, उम्मीद, मोहभंग, और मजबूती चारों से होकर गुजर चुकी थी।

इतनी कम उम्र में इतना गहरा अनुभव…
इतना भावनात्मक पहाड़ झेल चुकी थी वह…
कि सच कहूँ तो मैं बहुत हैरान हो गया।
मेरी सारी समझ, मेरा सारा आत्मविश्वास
क्षणभर में जैसे छोटा हो गया था।

मैं बस सोचता रह गया कि मैं जिसे अब धीरे-धीरे समझ रहा था,
वह अपने भीतर कितना सागर छुपाए हुए थी,
और मैं…
मैं तो अभी किनारों पर खड़ा
उसकी सतह को ही निहार रहा था।
 
आत्मध्याय 11                                               आत्मध्याय 13