pratibha pr parat 54
कक्षा की सबसे अद्भुत बात यही थी कि लगभग हर एक विद्यार्थी अपने-अपने हिंदी माध्यम के विद्यालयों में किसी-न-किसी रूप में श्रेष्ठ रहा था। कोई जिला-स्तर पर उभरकर आया था, कोई अपने गाँव में मेधावी माना जाता था, और कोई वह था जिसकी कॉपी-किताब को देखकर छोटे बच्चे भी प्रेरणा ले लिया करते थे। हम सब अलग-अलग मिट्टियों से आए थे, पर उन मिट्टियों की महक में मेहनत, संघर्ष, और आत्मविश्वास बराबर घुले थे।
लेकिन…जैसे ही हम अंग्रेज़ी माध्यम की दुनिया में आए, धीरे-धीरे सभी के भीतर एक अनोखा परिवर्तन दिखने लगा। किसी की चाल बदलने लगी, किसी की आवाज़ धीमी होकर किताबों के बोझ तले दबने लगी, और किसी की दृष्टि में एक अनकही घबराहट बसने लगी, मानो नई भाषा ने उसके वर्षों की प्रतिभा के चेहरे पर अचानक एक नक़ाब चढ़ा दिया हो।
भाषा ke badlav का प्रभाव सिर्फ़ शब्दों तक सीमित नहीं रहता। वह सोचने की गति को बदल देता है, सवालों को समझने की गहराई पर असर डालता है, और कभी-कभी तो इतने वर्षों की मेहनत को एक ही झटके में कमजोर महसूस करा देता है। यह मज़ेदार संयोग ही था कि पूरा अध्याय पढ़कर समझ लेने के बाद भी, जब प्रश्न सामने आता था, तो आधे लोग उसके अर्थ को ही समझने में उलझ जाते थे मानो ज्ञान भीतर था, पर भाषा ने उसके और दुनिया के बीच एक महीन-सी दीवार खड़ी कर रखी थी।
सबसे पीड़ादायक यह था कि किसी भी बच्चे में प्रतिभा की कमी नहीं थी वह तो मानो भीतर ही भीतर चमकती थी, लेकिन अंग्रेज़ी नाम की पतली-सी लकीर उस चमक को ढँक देती थी और परीक्षा पास आती थी तो यह लकीर धीरे-धीरे मोटी होती चली जाती, जब तक कि कई सहपाठी अपने ही आप पर शंका करने न लगें।
aisa nhi tha ki hindi chunane ka viklp nhi tha, parntu niyam ye tha ki school roj jana hai aur waha english me padhane wale adhyapak hote the. na hi ham kahi aur padhne ke liye ja skte the aur na hi adhyapak badale ja skte the. isliye hamne nirnay liya ki english me hi padenge aur kahi na kahi ye baat dimag me thi ki 12th ke baad english madhyam me hi padhna hai to kyo na nev majbut kiya jaye. prntu yhi nirnay result wale din kafi sathiyo ko bhari padne wala tha
कुछ चेहरों पर यह शंका उदासी बनकर उतरती, कुछ में चुप्पी भर जाती, और कई बार गुस्सा भी ऐसा उबलता था जो बाहर नहीं आ सकता था। सायद सब नही जान पाते की दोष उस व्यवस्था का है जो भाषा को प्रतिभा के ऊपर रख देती है, और जिसका दंश हर साल लाखों बच्चों को चुपचाप सहना पड़ता है।
फिर भी, इन चुनौतियों के बीच बैठा हुआ ‘हम’ एक ऐसी भीड़ थी जो पढ़ाई को सिर्फ़ अंक नहीं, बल्कि स्वयं को सिद्ध करने का अवसर मानती थी। हम गलती करने पर भी घबराते नहीं थे, बल्कि हर गलती के पीछे नई सीख ढूँढ लेते थे।
एक अनकहा भाईचारा,
एक निशब्द संघर्ष,
और एक ऐसा वातावरण…
जहाँ हर कोई किसी न किसी रूप में खुद से लड़ रहा था. यही बनारस, यही क्लास, और यही लोग हमारी उम्र के सबसे अनमोल शिक्षक बन गए जो हमें यह सिखा रहे थे कि प्रतिभा एक भाषा से नहीं, ईमानदार प्रयास और भीतर की आग से जन्म लेती है।

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