bechaini aur padhai 58

मेरे सहपाठियों में मेरा एक ऐसा मित्र था जो शांत, समझदार और थोड़ा अनुभवों के चक्र के साथ उलझा हुआ-सा लगता, मानो उम्र ने उसकी झोली में जितना डाला था उससे कहीं अधिक उसने जीवन से अपने हिस्से की सीखें निचोड़ ली हों। वह हमेशा संयत रहता था, कम बोलता था, और उसकी आँखों में एक अजीब-सी परिपक्वता दिखाई देती थी; ऐसी परिपक्वता जो सामान्यतः उन बच्चों में नहीं मिलती जो अभी-अभी किशोरावस्था की चढ़ानें चढ़ रहे हों। किंतु अंग्रेज़ी माध्यम में आने के बाद जैसे उसकी पूरी दुनिया ही बदलने लगी। उसकी सहजता जैसे कहीं छूट गई थी, और मुझे लगता था कि उसकी असली प्रतिभा के चारों ओर भी शायद भाषा की वही पतली, पर निर्मम लकीरें खिंच गई थीं, जो हम सबके आत्मविश्वास को एक-एक दिन खोखला कर रही थीं। उसके व्यवहार में अब एक हल्की-सी थकान बस गई थी। कभी खाने में लापरवाही, कभी पूरे दिन पानी न पीना, कभी क्लास में चुपचाप सिर झुकाकर बैठ जाना; और कभी ऐसा लगता कि वह अपनी ही ऊर्जा से लड़ रहा हो, जैसे कुछ भीतर ही भीतर टूट रहा हो और वह उसे पकड़े रखने की पूरी कोशिश कर रहा हो। 

उन दिनों कोचिंग का दबाव बढ़ गया था, असाइनमेंट्स का भार बढ़ चुका था, और रातें पढ़ाई की चिंताओं में इतनी कटतीं कि सुबहें खुद को सँभालने की जद्दोजहद में बीत जाती थीं। ऐसे ही एक सुबह जब वह आधी अधूरी नींद में अपने बिस्तर पर किसी युद्धरत सैनिक की तरह पड़ा था, आँखों के नीचे हल्के, माथे पर शिकनें, और अंदर से जैसे कोई अनकहा तनाव फटने को तैयार..मैं उसे कोचिंग के लिए जगाने गया। और उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि मेरे इस दोस्त के भीतर भी पढ़ाई, भाषा और प्रतियोगिता का तनाव किस रूप में खदबदा रहा है।

मैंने धीरे से आवाज दी “चलो, क्लास का समय हो रहा है…”और उसी क्षण वह पलटा, आँखों में उन लड़ाइयों का पूरा धुआँ लिए जो वह रातों में अकेला लड़ता रहा था।

उसने कहा- “कसम आज की नींद का, अभी एक मिनट भी मत बोलो…” उस आवाज़ में केवल झुंझलाहट नहीं थी, बल्कि एक टूटन का कंपन, एक डर का कंपन, और एक ऐसी थकान, जो शब्दों से बड़ी हो चुकी थी। 

उस क्षण मुझे पहली बार समझ आया कि भाषा का संघर्ष केवल किताबों से नहीं होता, वह नींद को भी खा जाता है, मन को भी खरोंचता है, और आत्मविश्वास को ऐसे पिघला देता है जैसे किसी गर्म जून की धूप में मोम।

मैं वहीं खड़ा रह गया, थोड़ा-सा विचलित, थोड़ा-सा असहाय क्योंकि मैंने उसकी आँखों में सिर्फ नींद का गुस्सा नहीं देखा, बल्कि वह अदृश्य दबाव देखा जो अंग्रेज़ी माध्यम में आने के बाद हम सबकी साँसों में उतर चुका था। मुझे लगा जैसे उसकी आँखें कह रही हों “हम प्रतिभाशाली हैं, मूर्ख नहीं, पर एक भाषा की दीवार हमारे भीतर का आत्मविश्वास रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ देती है। हम सोते नहीं, गिरते हैं क्योंकि अगली सुबह फिर वही लड़ाई लड़नी होती है।”

और इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ek kavita hai jo is bhav ki vyakhya krne me mddt kr skta hai. 

मानो वह खुद मुझसे कह रहा हो…

“कसम आज की नींद का,जो किसी ने भी पहरा हटाया।

खबरदार जो किसी ने वक्त पर जगाया।।


आलस से पूरा भरा ही सही, तकिया में चेहरा गड़ा ही सही।

बिस्तर पर मुर्दा पड़ा ही सही;  पड़ा रहने दो

कीमत है मेरी कबाड़ी नही हूँ, चलता चलूँ कोई गाड़ी नहीं हूँ।

हमेशा रहा भीड़ की मैं नज़र में, कभी दूर दुनिया से खोया नहीं हूँ।

ऐसा भी क्या मैं बड़ा हो गया हूँ, कि वर्षों से बच्चे सा सोया नहीं हूँ।।


यूट्यूब पर लेक्चर को तकता, चेहरा मेरा टपाटप टपकता हुआ।

पंखे के फैले हुए शर्द मे, गर्दन सुलगता हुआ दर्द मे।

अगर एक झपकी गुज़रती है,आँखों को छुके,

लोगों को मै तो नशे में हु लगता बिना माल फूँके।


वही सबके दुखड़े का रोना सभी का,

वही एक सा जैसा होना सभी का।

नया फूल दुनिया में खिलना नहीं है,

उठकर मुझे कुछ भी मिलना नहीं है।


तो समझो कि महँगा है जोखिम उठाया,

किसी ने मुझे वक्त पर जो जगाया।

कब से मैं ख़लबट में खोया नहीं हूँ,

वर्षों से बच्चे सा सोया नहीं हूँ।”

waise ye meri khud ki kavita nhi , in dino mai intagram chalta tha to wahi kahi suna tha aur isko thoda tod mrod ke apne dost ke bhav ko samjhane ke liye likh diya .

आत्मध्याय 13                                         आत्मध्याय 15