इतने तनाव, इतनी उलझनों के साथ भाषा का दबाव, भविष्य की चिंता, प्रश्नों का अर्थ न समझ पाने की झुंझलाहट, और हर रात तकिये में सिर गाड़कर सोने की छिपी हुई थकान…इन सबके बावजूद हम तीन दोस्त किसी अजीब-सी जिद के सहारे फिर भी मुस्कुरा लेते थे। शायद इसलिए क्योंकि हम जानते थे कि ज़िंदगी की कसौटी पर इंसान अपनी ही हँसी का मोहताज होता है। और कई बार कठिन दिनों में सबसे छोटी मुस्कान जीवन की सबसे बड़ी जीत बन जाती है।

हम तीनों कभी यह सोचकर हँस पड़ते कि पढ़ाई ने हमें कैसा विदूषक बना दिया है, और कभी यह महसूस कर कि हमारे अंदर जितनी घबराहट थी, उतनी ही घबराहट दूसरों की आँखों में भी थी…बस, कोई खुलकर कह नहीं पाता था। कभी हम पढ़ाई की झुँझलाहट पर हँसते, कभी जीवन की विडंबनाओं पर, कभी एक-दूसरे की बेवकूफियों पर और कभी बस इसलिए कि हँसना ज़रूरी था क्योंकि न हँसते, तो टूट जाते। और आज सोचता हूँ शायद यही दोस्ती का असली अर्थ hai yani ki वह अनकही समझ जो कठिन पलों में किसी सहारे की तरह हमारे कंधों पर हाथ रख देती थी। maine  सीखा कि ज़िंदगी चाहे कितनी भी भारी क्यों न हो, अगर तीन दोस्त साथ हों तो  बोझ ka bhar  आधा ही महसूस होता है।

आत्मध्याय 14                                         आत्मध्याय 16