काफ़ी मनुहार, तर्क, हल्की नोकझोंक और बेचैनी से भरे संवाद के बाद वह आखिरकार तैयार हुआ अपनी पसंद के बारे में बताने को। यह कोई सामान्य सवाल नहीं था. यह ऐसा प्रश्न था जो किसी के भीतर छिपे सबसे नाज़ुक, सबसे सच्चे और सबसे निष्कलुष भावों को बाहर खींच लाता है।
मैंने धीरे से कहा, "उसके बारे में बताओ… सच-मुच जैसा तुम महसूस करते हो वैसा।"
वह कुछ क्षण चुप रहा फिर इतनी गंभीरता से बोला ki maine socha hi nhi tha .
usne kaha ki "उसकी कमियों और बुराइयों के लिए मेरे पास एक भी शब्द नहीं है। उसके इस उत्तर ने मुझे ठिठका दिया।
मैंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा, "ठीक है, कमियाँ नहीं बताना चाहते तो उसकी कुछ तारीफ़ ही कर दो।"
वह धीमे से मुस्कुराया… पर उस मुस्कान में कुछ कंपन था जैसे दिल किसी पुरानी याद को छूकर काँप उठा हो।
फिर बोला,"तारीफ़? उसके लिए तो पूरा दिन कम पड़ जाएगा… शायद पूरा हफ़्ता… या महीने भी।" मैं सचमुच हक्का-बक्का रह गया। ऐसा प्रेम आजकल देखने को कहाँ मिलता है?
मैंने उत्सुकता से कहा, "चलो… जितना थोड़े में समा सके उतना ही सुना दो, एक क्षणचित्र की तरह।"
उसने गहरी साँस ली जैसे किसी बहुत कीमती स्मृति को धीरे से बाहर निकालने जा रहा हो। फिर बोला-"इतना समझ लो की उसे खूबसूरत दिखने के लिए श्रृंगार की कोई जरूरत नही है क्योकि खुद 'श्रृंगार' के ऊपर जो बिंदी है, वह उसके माथे की है…और संध्या के समय, जब वह सोने से पहले उसे उतारकर जो ऊपर लगा देती है तो लोगों को लगता है चाँद निकल आया।"
ये पंक्तियाँ उसके मुँह से निकली भर थीं… वैसे ही यह सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं उस पल स्तब्ध था, निरुत्तर, जैसे सौंदर्य का कोई दिव्य रहस्य सामने खुल गया हो। उसकी आवाज़, उसका भाव, उसकी आँखों की चमक सब कुछ इस बात का प्रमाण था कि वह प्रेम कोई हल्का या क्षणिक एहसास नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जो आदमी को भीतर से बदल देता है, उसे और संवेदनशील, और कोमल, और कहीं गहरे इंसान बना देता है।
आत्मध्याय 16 आत्मध्याय 18

1 टिप्पणियाँ
दर्द को भी खुबसूरत से दिखाने का अलग अंदाज है। उसकी गुलाब कि पंखुड़ी सी ओढ़ एक अलग ही अंदाज है।
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