Adhura dosr 65
हम तीनों एक दिन किताबों से भरी दुनिया, सपनों से भरी थकान, और तनाव से भरे दिमागों के बीच ज़रा-सी राहत के लिए कैंपस के नीम की छाँव में बैठ गए थे। भारत की शिक्षा-व्यवस्था के दबाव और हमारी अपनी सीमाओं ने हमारे भीतर इतने संवाद, इतने सवाल जमा कर दिए थे कि ham ye nirnay hi nhi kr pa rhe the ki ham galat hai jo english me thik se samjh nhi pa rhe hai ki ya ye sarkar samaj aur sarkar galat hai jo english bhasa ko itna prathamikta deta hai ya fir hamre mata pita jo is jo is kabil nhi ho paye ki ham ham suru se hi english madhyam me padh ske ..इसी अनौपचारिक सी हंसी-ठट्ठे वाली बातचीत के बीच मेरे मन में अचानक एक पुराना-सा जिज्ञासु प्रश्न उठ आया, एक ऐसा प्रश्न जिसे अक्सर लोग पूछने में हिचकते हैं, लेकिन जब दोस्ती मे समय के साथ हिचकिचाहट की दीवारें कमजोर हो जाएँ, तो ऐसा प्रश्न खुद-ब-खुद जन्म ले ही लेता है।
मैंने धीमे से पूछा-“अरे, एक बात बता कभी किसी का स्वभाव, किसी की मुस्कान, किसी की आदत या यूँ कहूँ कि किसी की ‘आवाज़’ भी…तुझे ऐसे लगी हो कि हृदय कुछ देर रुक-सा जाए? कभी कोई लड़की ऐसी लगी… जो याद न होकर भी याद रह जाए?” मेरे सवाल के बाद कुछ पल की खामोशी छा गई। वह सिर झुकाकर मिट्टी में अपनी चप्पल से गोल-गोल धेर बनाता रहा। उसने ऊपर देखा और पहली बार मुझे लगा कि उसकी आँखों में कोई पुराना मौसम फिर से जाग उठा है…जैसे कोई ऐसी याद, जिसे उसने बहुत कोशिश कर दफनाया था, वो खामोशी में फिर से धड़क उठी हो।
उसने सर हिलाया, थोड़ा-सा हँसा, पर वह हँसी बहुत हल्की थी… जैसे टूटी हुई कांच को कपड़े से ढक देना, कि किसी को चोट न लगे।
फिर उसने कहा-“देख, कुछ किस्से ऐसे होते हैं जिन्हें बताना तो मुश्किल होता ही है पर जीना… उन्हें जीना बहुत मुश्किल।” मैं चुप रहा क्योंकि उस वक़्त उसकी आँखें किसी क्षितिज की तरफ़ देख रही थीं जहाँ शायद एक पुराना चेहरा, एक पुरानी हँसी, या कोई अधूरा वादा अब भी टंगा हुआ था।
वह बोला-
“हाँ, कोई थी…पर कुछ लोग… यादों में अच्छे लगते हैं, वास्तविकता में नहीं।”
उसकी आवाज़ में मिठास भी थी, थोड़ी थकान भी, और एक गहरा, लंबे समय से दबा हुआ पछतावा भी...जैसे वह कहना चाहता हो कि हर प्रेम कहानी पाने के लिए नहीं होती, कुछ समझने, कुछ बदलने, और कुछ ज़िंदगी का पाठ पढ़ाने के लिए होती हैं।
fir usne halki aur dhimi awaj me kaha "pr kuch bato ko dhafan rha dena hi behtar hai" मैंने होठ भींचकर कहा- “चल… ठीक है, पर एक बात तो बता, क्या उसका असर अभी भी है?”
उसने हल्की साँस ली और कहा, “असर नहीं कहूँगा…पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें भुलाना भूल जाने से भी कठिन होता है।” वह यह कहते हुए ज़रा-सा मुस्कुराय. उस मुस्कान में हार भी थी, और स्वीकार भी।
आत्मध्याय 15 आत्मध्याय 17

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