एक शख्स को शामिल खुद में करने का इरादा कर बैठे थे,

जितनी मोहब्बत बस की थी, हम उससे ज्यादा कर बैठे थे।


तुम्हारा और उनका बिछड़ना तो "नागुज़ीर" था ख्यालात में,

वो पल जो थोड़े से थे, उन्हें युगों का फ़साना कर बैठे थे।


भला क्यों न जाती छोड़कर मुझको एक शहजादे खातिर वो,

शतरंज-ए-इश्क़ में रानी उसे, हम खुद को प्यादा कर बैठे थे।


Explanation 

Stanza 1

शेर में कवि ने आत्म-विलय की भावना को अभिव्यक्त किया है। वह कहता है कि एक व्यक्ति को केवल प्रेम करना ही उद्देश्य नहीं था, बल्कि उसे स्वयं में सम्मिलित कर लेने का दृढ़ निश्चय कर लिया गया था। प्रेम की सामान्य सीमाओं को लांघते हुए कवि ने उस व्यक्ति को अपेक्षाओं से अधिक प्रेम प्रदान किया। यहाँ "बस की थी" और "ज्यादा कर बैठे थे" के विरोधाभास से यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपने सामर्थ्य से अधिक प्रेम कर डाला, जो एक प्रकार की आत्म-भूल भी दर्शाता है।


Stanza 2 

इस शेर में कवि ने मोहब्बत में बिछड़ने की अपरिहार्यता (inevitability) को स्वीकार किया है। 'नागुज़ीर' शब्द इस यथार्थ को सूचित करता है कि जुदाई पहले से अनुमानित थी। परंतु, उन सीमित और क्षणिक लम्हों को कवि ने इतनी गहराई से अनुभव किया कि वे पल कालजयी (timeless) बन गए। अल्पकालीन साथ को कवि ने अनंत स्मृति में रूपांतरित कर दिया - यह भावनात्मक अतिरंजना प्रेम की तीव्रता को दर्शाती है।

Stanza 3

इस शेर में प्रेम के त्यागात्मक स्वरूप को शतरंज के प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। कवि स्वीकार करता है कि उस व्यक्ति ने उसे इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह अपने लिए किसी राजसी जीवन या महत्त्वपूर्ण स्थान की आकांक्षा रखती थी। कवि ने स्वयं को एक साधारण प्यादा (pawn) और उसे रानी (queen) का दर्जा दे दिया- यह प्रेम में आत्म-निवेदन, हीनताबोध और समर्पण को प्रतीकात्मक रूप से प्रकट करता है। यह शेर प्रेम में सामाजिक या आत्मिक असमानताओं को रेखांकित करता है।