इस दिल ने तुझे बेपनाह चाहा मगर,
तेरे हिस्से की कोई तवज्जोह भी नहीं है।
तू समझा मुझे इक फ़िज़ूल सा ख़्वाब,
और मेरे आँखों में अब कोई नींद भी नहीं है।
तू खुदा नहीं, फिर भी सजदे किए मैंने,
अब उस खता की कोई तौहीन भी नहीं है।
मेरा हुनर अब सिर्फ खामोशियाँ हैं,
लब खुले हैं मगर कोई तक़रीर भी नहीं है।
इस कदर अभी तेरे मुरीद भी नहीं है,
तरसे तेरे लिए मेरे दीद भी नहीं है।
जो दाम तुमने लगाए हैं दिल के मेरे,
यकीन मानो इतनी की तो खरीद भी नहीं है।
शब्दकोश
तवज्जोह -ध्यान, आदर, और सम्मान तक़रीर-बातचीत, बोलना, सजदे- पूर्ण समर्पण और विनम्रता तौहीन -अपमान मुरीद-आदत, दीद-न्याय
Explanation
Stanza 1
शायर ने अपनी मोहब्बत में कोई कसर नहीं छोड़ी – बेपनाह चाहा। लेकिन जिसको चाहा, उसे तो उसकी चाहत की कोई कद्र ही नहीं थी। वो तो शायर को एक अधूरा, बेमतलब सपना समझ बैठा। अब न कोई उम्मीद बची है, न ही वो चैन की नींद… ये इश्क़ सिर्फ तकलीफ़ दे गया।
Stanza 2
मोहब्बत में इंसान कभी-कभी अपने महबूब को खुदा बना देता है – यहाँ भी वैसा ही हुआ। शायर ने झुककर उसे पूजा, इबादत की। अब वो मानता है कि ये उसकी गलती थी, पर अब वो गलती भी गुनाह नहीं लगती। अब तो उसके लफ्ज़ भी खामोश हो गए हैं – जैसे दिल की दुनिया सुनी पड़ी हो।
Stanza 3
अब मोहब्बत भी जैसे एक सौदा बन गई है। शायर कहता है – तुम्हारे जैसे दीवाने और भी नहीं हैं, और अब मैं भी तड़पना छोड़ चुका हूँ। मगर तुमने तो मेरे दिल की भी कीमत लगा दी… और यकीन मानो, वो इतनी ऊँची है कि कोई खरीद ही नहीं सकता। क्योंकि सच्ची मोहब्बत बिकाऊ नहीं होती।
2 टिप्पणियाँ
Mast h explosion thoda aur axe hoga
जवाब देंहटाएंदर्द है भाई
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