“वो, जो अब तक मेरी कल्पना के पार है” कभी-कभी लगता है, कुछ लोग बनाए ही इसलिए जाते हैं —…
आज जब घर की सफ़ाई में मैं धूल के परतों और पुराने जालों को समेट रहा था, तो लगा जैसे हर…
“तुम, मैं और थोड़ा सा ब्रह्मांड” कभी-कभी लगता है तुम ग्रहों की हो मेहमान, जो भूल ग…
शून्य सरीखी शरण तेरी, शब्दों में संचित स्नेह धरी श्वासों से स्वर साध लिया श्रद्धा से म…
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