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जब एक साधारण-सा विद्यार्थी 11वीं की सहज, हल्की, लगभग बेफ़िक्र दुनिया से उठकर 12वीं के तीखे, निर्णायक और दमनकारी मोड़ पर पहुँचता है, तो यह बदलाव बाहर से जितना छोटा दिखाई देता है, अंदर से उतना ही विशाल, भारी, और कई बार असहनीय अनुभव होता है क्योंकि 11वीं तक जीवन किसी ऐसी नदी के समान लगता था जिसकी धारा शांत हो, किनारे चौड़े हों, और जिसमें तैरने वाले को यह डर न हो कि कब धारा अचानक गहराई में ले जाएगी।11वीं की पढ़ाई अपने-आप में कोई पढ़ाई ही नहीं थी; यह किताबों को खोलकर देखने का दिखावा था। यह अध्यापक की आवाज़ को ध्यान से सुनने का भ्रम था। यह भविष्य की गंभीरता को बहुत दूर की बात समझकर वर्तमान की ढीली-ढाली स्वतंत्रता में जीते रहने का सुख था। पर 12वीं की दहलीज़ पर कदम रखते ही जैसे पूरा वातावरण किसी अज्ञात कारण से भारी हो गया, मानो हवा का रंग बदल गया हो, मानो कक्षा के पंखे की आवाज़ में भी किसी अनदेखी चेतावनी की धुन समा गई हो, मानो हर दीवार, हर मेज़, हर नोटबुक यह पुकारने लगी हो कि “अब जीवन खेल नहीं है; अब हर कदम दर्ज होगा।”
परिवार, शिक्षक, रिश्तेदार, यहाँ तक कि वे लोग भी जो कभी आपकी पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं लेते, अचानक आपको ज्ञान देने लगते “भावनाओं पर नियंत्रण रखो।”
“यह साल बहुत महत्वपूर्ण है।”
“ये उम्र भटकाती है, संभलकर चलो।”
“अब बस पढ़ाई में मन लगाओ।”
और विडंबना देखो, जितना ज़ोर से दुनिया कहती कि अपने मन को नियंत्रित करो, उतना ही मेरे भीतर का मन अपनी ही पकड़ से बाहर होता चला जाता था, जैसे किसी जंगली घोड़े को बाँधने की कोशिश की जाए जो जितना रोका जाए उतनी ही तेज़ी से बिदक उठे। किशोरावस्था का शरीर, जो पहले ही अपने असंख्य रासायनिक परिवर्तनों से भरा पड़ा था, एक ऐसा रणभूमि बन चुका था जहाँ भावनाएँ, इच्छाएँ, डर, तनाव,आशाएँ और उलझनें एक-दूसरे पर लगातार प्रहार कर रही थीं। और मैं, उस युद्ध का एकमात्र साक्षी, समझ ही नहीं पाता था कि किस पक्ष का साथ दूँ, और किस पक्ष को शांत करूँ। और इसी चक्कर में मन में एक अजीब-सी फाँस उभरती कि आखिर लोग इतनी आसानी से कैसे कह देते हैं कि भावनाओं पर नियंत्रण रखो?' क्या वे भूल चुके होते है कि उन्होंने भी यह उम्र कभी जी थी? या उन्होंने अपनी इस लड़ाई के घाव इतने गहरे दबा दिए कि वे हमें आज उपदेश देने लायक बन गए?
लेकिन मेरा संघर्ष तो दोहरा था क्योंकि इसी समय मैं बनारस में था, और बनारस कोई साधारण शहर नहीं कि जिसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाए या जिसकी सुंदरता को मन से हटाया जा सके। बनारस एक ऐसा शहर था जो अपनी हर साँस में किसी गहरे रहस्य का आह्वान करता है। अपनी हर गली में किसी नई दार्शनिकता को जन्म देता है, और अपनी हर सुबह, हर शाम में उम्र के हर यात्री को भीतर से झकझोरने की ताक़त रखता है। कक्षा में बैठकर भी मेरा मन पढ़ाई और बनारस के बीच किसी अदृश्य रस्साकशी में फँसा रहता था। जहाँ किताबें मुझे भविष्य की ओर खींचतीं और बनारस की धूप, उसकी घाटों की गंध, उसकी गलियों की धड़कन मुझे वर्तमान को महसूस करने पर मजबूर करती। किताबें खुली रहतीं पर पन्नों की लिखावट के नीचे घाटों की लहरें तैरती दिखाई देतीं। शिक्षक बोर्ड पर सूत्र लिखते और मेरे भीतर किसी अनाम भावना के सूत्र उलझते चले जाते।
लोग कहते है की“12वीं में घूमना कम कर दो, दिल पर काबू रखो, मन को बहकने मत दो,” लेकिन वे नहीं समझते थे कि इस उम्र में मन को रोकना ऐसा है जैसे तूफ़ान को बाँधने की कोशिश करना या बादलों को रोके रखना कि वे बरसें नहीं। मैं यह सब झेल रहा था और खुद यह भी समझ रहा था कि मैं सिर्फ़ पढ़ाई का दबाव नहीं सह रहा, बल्कि अपने विकसित हो रहे अस्तित्व का भार भी उठाए हुए हूँ। एक ऐसा अस्तित्व जो पढ़ाई, परिवार, अनुशासन और भविष्य की इच्छाओं के बीच अपनी जगह खोज रहा था, और जो बार-बार खुद से पूछता की “क्या मैं सिर्फ़ एक विद्यार्थी हूँ या जीवन की बड़ी कहानी का एक पात्र हूँ जिसे अभी खुद को समझना बाकी है?”

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