समाज की नज़रों में “तवायफ़” एक नाम नहीं, एक निर्णय है ,एक ऐसी स्त्री जो महफ़िलों की रौशनी में नाचती है, गाती है, और दूसरों के मनोरंजन का माध्यम बन जाती है। लोगों के लिए वह एक सजी हुई देह है, एक हँसता हुआ चेहरा जो रात के अंधेरों में चमकता है और सुबह होते ही ओझल हो जाता है। किसी के लिए वह वासना की प्रतीक है, किसी के लिए तमाशा।

           पर बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि उस चमक के पीछे कितनी थकान, अपमान और एकांत छिपा है। उसका जीवन किसी बंद खिड़की जैसा है, बाहर से सजा हुआ, भीतर से दमघोंटू। वह जब नाचती है, तो तालियाँ बजती हैं; पर उन तालियों में आदर नहीं, स्वार्थ की गूँज होती है। हर रात वह किसी और की खुशी बनती है, पर खुद की खुशी कब से खो चुकी है यह शायद उसे भी याद नहीं।

          महफ़िल के बीच जब वह गाती है, तो उसकी आवाज़ में संगीत नहीं, सहनशीलता का स्वर होता है। वह एक ऐसी स्त्री है जिसे समाज ने मंच दिया, पर पहचान नहीं; जिसे आदतें दीं, पर इज़्ज़त नहीं; और जिसने सबकी आँखों को सजाया, पर किसी के दिल में जगह न पाई।

       लोग उसे हँसते हुए देखते हैं, पर कोई नहीं जानता कि उसकी हँसी में कितने बुझ चुके सपने छिपे हैं। वह हर दिन जीती है, पर ज़िंदगी कभी उसकी नहीं रही क्योंकि उसे हमेशा किसी और के लिए जीना पड़ा है।

वह अक्सर सोचती है की कितना छोटा है यह संसार, और कितनी संकीर्ण हैं ये दृष्टियाँ। जो लोग दिन में धर्म की बातें करते हैं, वही रात को उसकी देहरी पर अपनी नैतिकता उतार आते हैं। किसी ने उसे पाप कहा, किसी ने पतन पर किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि उसकी मुस्कान कितने अपमान के बीच जन्मी है।
वो कहती नहीं, पर सब सुनती है, जब कोई उसके चलने के अंदाज़ पर हँसता है, जब कोई उसकी आँखों को “लुभावना” कहकर उसके अस्तित्व को वस्तु बना देता है। वो जानती है, ये सब वही लोग हैं जो अपने भीतर की गंदगी को छिपाने के लिए दूसरों की इज़्ज़त उछालते हैं।
कभी-कभी उसे लगता है कि दुनिया की सबसे सस्ती चीज़ किसी स्त्री की इज़्ज़त पर राय देना बन गई है। लोग सोचते हैं कि वे उसे परिभाषित कर सकते हैं, पर वे भूल जाते हैं कि किसी आत्मा की गहराई नापने के लिए सिर्फ आँखें नहीं, हृदय चाहिए।
फिर भी वह टूटी नहीं। उसने इन सबके बीच जीना सीखा है, जैसे कोई कमल कीचड़ में खिलता है और अपने रंग को बचाए रखता है।
और शायद इसी वजह से मेरी नज़रों में वह और भी सुंदर लगने लगी  क्योंकि जहाँ लोग अशुद्धता देखते हैं, उसने वहाँ पवित्रता की अपनी परिभाषा गढ़ी है।
लोग उसे आँकते हैं, पर मै उसकी आँखों में मानवता का दर्पण देखता हूँ।
मै जानता हु दुनिया की सोच की गंध जहाँ ख़त्म होती है, वहीं से एक लेखक की शुरुआत और सुगंध शुरू होती है।
   

                                                                Rukhan!