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समय बीतता गया, और अब जीवन का एक नया अध्याय खुलने लगा। विद्यालय में मैंने देखा कि केवल लड़के ही नहीं, बल्कि अनेक जिलों, प्रदेशों से आई हुई लड़कियाँ भी हमारे साथ अध्ययन कर रही थीं। पहली बार मेरे सामने यह परिस्थिति थी जहाँ सीखने का संसार साझा था, परंतु अनुभव मेरे लिए बिल्कुल नया। 

         अब तक मैं उस विद्यालय संस्कृति में पला था जहा केवल लड़के होते थे। अब यहा संवाद का संसार सीमित था, जहाँ स्त्री-पुरुष के बीच की दूरी को एक अदृश्य मर्यादा की रेखा से नापा जाता है। इसलिए यह नया अनुभव मुझे भीतर तक विचलित कर गया। कैसे बात की जाए? क्या कहा जाए? कहीं मेरी बात का अर्थ कोई और न निकाल ले? यही प्रश्न मेरे भीतर दिनों तक गूंजते रहे मानो विचारों के भीतर एक निश्चल युद्ध चल रहा हो, जहाँ मैं स्वयं से ही जीतने और हारने दोनों से डर रहा था। समाज का प्रभाव भी कुछ कम नहीं है। लोगों की दृष्टि, उनके त्वरित निर्णय, और यह धारणा कि “लड़का और लड़की का मेल सिर्फ एक ही अर्थ में देखा जा सकता है।” इन सबने मेरे विचारों को और उलझा दिया। कई बार मैं बस चुप रह जाता, सामान्य संवाद भी करने में संकोच महसूस करता था,पर भीतर कहीं यह सवाल भी उठता- क्या हर संबंध को संदेह की दृष्टि से देखना ही संस्कृति है? क्या पवित्रता केवल दूरी में है, या समझ में भी हो सकती है?

       कई महीनों तक मैं इन्हीं प्रश्नों की आँधियों में उलझा रहा। एक ओर जिज्ञासा थी। उन्हें समझने की, उनके विचारों को सुनने की। और दूसरी ओर समाज की दीवारें थीं। जो हर स्वाभाविक भाव पर ताले जड़ देती थीं। इन दिनों में मैंने पहली बार यह महसूस किया कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष दूसरों से नहीं, अपने भीतर की परवरिश और सोच से होता है। और शायद उसी संघर्ष में, मैं धीरे-धीरे एक नई समझ की ओर बढ़ रहा था, जहाँ सम्मान और जिज्ञासा के बीच संतुलन ही सबसे बड़ा सीख थी। 

      समय बीतने के साथ साथ अब मै धीरे-धीरे समय ने मुझे थोड़ा बदलना शुरू किया, इस बदलाव के पीछे जो कहानी है उसे आगे बताने की कोशिश करूगां क्योकि किसी के सोच मे बदलाव आने के पीछे कोई छोटी वजह नही होती है। 

     अब भी किसी लड़की से बात करने में हिचकिचाहट होती है, जैसे शब्द होंठों तक आते-आते कहीं अटक जाते हैं। मन में न जाने कितनी सावधानियाँ और संकोच एक साथ जाग उठते हैं, मानो हर वाक्य बोलने से पहले उसे सौ बार परखा जाना चाहिए। परंतु अब यह भी महसूस होने लगा है कि हर मौन दूरी नहीं होता, कई बार वह सम्मान की भाषा भी होता है। उनकी बातों को, उनके भावों को मैं धीरे-धीरे समझने लगा था। और शायद यही एहसास पहली सच्ची समझ का आरंभ है जब हम किसी को देखने के बजाय महसूस करने लगते हैं।



आत्मध्याय 3                                                      आत्मध्याय 5