जैसे ही मेरा हाथ आगे बढ़ा, मुझे महसूस हुआ कि हमारे बीच एक अदृश्य-सी सीमा खड़ी है; संस्कारों की, मर्यादाओं की, और शायद उन उम्मीदों की जो हम दोनों अपने-अपने घरों से लेकर आए थे। 

वह कुछ पल के लिए मेरी ओर देखती रही। उसकी नज़रें ठहरी हुई थीं, जैसे वह मेरे इरादे को पढ़ लेना चाहती हो...क्या मैं सिर्फ एक क्षणिक हिम्मत के सहारे यह कदम उठा रहा हूँ या वाकई एक साफ नीयत से। उसकी उंगलियाँ हल्के से हिलती हुई लगीं, मानो वह आगे बढ़कर मेरा हाथ पकड़ने का साहस जुटा रही हो, पर अगले ही क्षण उसकी उंगलियाँ फिर से सिमटकर अपनी ही हथेली में खो गईं, जैसे वे भी जानती हों कि अभी भीतरी बाधाएँ बाहरी संकेतों से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। शायद इसलिए कि वह भी अपने संस्कारों को मेरे जितना ही मान देती थी। पर उसने अपना चेहरा नहीं फेरा न ही किसी अस्वीकार का संकेत दिया।

उसकी वही नरम-सी हिचक, वह आधी मुस्कान, और कुछ कहे बिना व्यक्त किया गया उसका अपनापन मेरे लिए किसी स्पर्श से कम नहीं था। मुझे उस दिन गहराई से समझ आया कि कई बार जीवन में लोग तुम्हारे हाथ नहीं पकड़ते, पर तुम्हारे मन को थाम लेते हैं। और उस क्षण, बिना उंगलियों के छूए, कुछ भीतर ज़रूर छू गया था जैसे दो अजनबी अपनी-अपनी जगह खड़े रहकर भी एक ही दिशा में चलना शुरू कर देते हों। हाथ नहीं मिला था, पर शुरुआत हो चुकी थी एक ऐसी शुरुआत जिसमें झिझक थी,  ईमानदारी और दूरी  पर अपनापन भी और सबसे बढ़कर, एक ऐसा अनकहा भरोसा था जो शब्दों में नहीं, अनुभव में उतरता है।


आत्मध्याय 5                                             आत्मध्याय 7