next आत्म परिवर्तन का बड़ा मोड़ 

अब धीरे-धीरे बातचीतों का सिलसिला जीवन का हिस्सा बनने लगा था। और धीरे धीरे सबका सबसे बातचीत मे अब ज्यादा संकोचन नही था शुरुआत बहुत साधारण थी  कभी किसी नोट्स का आदान-प्रदान, कभी क्लास के किसी विषय पर छोटी-सी चर्चा। परंतु इन छोटी बातों में भी एक अनजानी गर्माहट थी, जैसे कोई नया संसार धीरे-धीरे खुल रहा हो।

पहले जहाँ लड़कियों से बात करने का विचार ही भीतर एक झिझक भर देता था, वहीं अब समझ आने लगा था कि वे भी हमारी ही तरह विचारों, संवेदनाओं और उलझनों से भरी आत्माएँ हैं। उनके शब्दों से ज़्यादा उनके मौन बोलते थे। कभी किसी की आँखों में अधूरी नींद दिखती थी, तो कभी किसी की मुस्कान में छिपे संघर्ष का एहसास होता था। और शायद यहीं से मेरा दृष्टिकोण बदलने लगा, अब मैं केवल चेहरे नहीं देखता था, मैं उन चेहरों के पीछे की कहानियाँ पढ़ने लगा था। कभी सोचता, क्या यह वही मैं हूँ जो कुछ महीनों पहले तक किसी लड़की से बात करने में हिचकिचाता था? अब तो लगता है, शब्दों से पहले भावनाएँ संवाद करने लगी हैं। जैसे कोई निश्चल समझ, जो बिना बोले सब कह जाती है। कक्षा अब केवल अध्ययन का स्थान नहीं रहा था, यह मानवीय संबंधों का एक प्रयोगशाला बन गया था, जहाँ हर व्यक्ति एक किताब की तरह खुल रहा था , कोई कविता की तरह सरल, कोई रहस्य की तरह गूढ़।

कभी भीतर यह प्रश्न भी उठता था;  क्या यह सब महज़ एक संयोग है या नियति की कोई रचना? क्योंकि जैसे एक ही हाथ की पाँच उँगलियाँ अलग होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक होती हैं, वैसे ही हम सब भी अलग-अलग जिलों से आए हुए, अलग संस्कृतियों से पले लोग, किसी अदृश्य शक्ति से बंधे प्रतीत होते थे। कभी यह भी महसूस होता कि एक ही धारा में बहती दो किस्मतें, कितनी भी प्रयास करें, अंततः एक ही सागर में मिल जाने के लिए बनी हैं। शायद यही जीवन का सौंदर्य है.. कि कुछ संबंध शब्दों से नहीं, बल्कि समझ की नमी से सींचे जाते हैं।

धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ रहा था। अब सिर्फ आमने-सामने मुस्कुराना या हल्की-फुल्की बातचीत ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के बारे में जानने की इच्छा भी बनने लगी थी। एक दिन हिम्मत करके मैंनें ही बात छेड़ दी, “अगर तुम्हें ठीक लगे… तो बात के लिए नंबर दे सकती हो?” मेरे कहने भर से वह चौंकी नहीं, उल्टा उसने उसी सहजता से कहा-“तो तुम ही अपना नंबर दे दो, मैं सेव कर लेती हूँ…” उस एक वाक्य में जितनी सरलता थी, उतना ही मेरे अंदर हलचल मच रहा था। मैंने नंबर बताया, उसने सेव किया… फिर उसका भी नंबर मुझे मील गया। वह क्षण सिर्फ दो संख्याओं का आदान–प्रदान नहीं था बल्कि दो दुनियाओं का, दो भरोसों का और दो अनकहे विश्वासों का पहला पुल था।

  इसी बीच VP सर के द्वारा पूरे विज्ञान वर्ग के लिए एक अलग व्हाट्सऐप ग्रुप बना दिया गया था । उसमें हर किसी का नंबर दिख रहा था, जैसे हम सब अपने-अपने कोने छोड़कर एक साझा आँगन में आ गए हों। उस ग्रुप के बनते ही वातावरण बदल गया। अब हम सिर्फ कक्षा के छात्र नहीं थे, बल्कि एक जुड़ा हुआ समुदाय बन चुके थे। जहाँ नोट्स भी साझा होते थे, सवाल भी, हँसी भी, और धीरे-धीरे… एक-दूसरे की आदतें भी। 

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इंग्लिश की कक्षा में एक बात बहुत स्पष्ट दिखाई देती थी कुछ लड़के पहले से ही इंग्लिश माध्यम के थे। उनकी बोली, उनका उच्चारण, उनकी आत्मविश्वास भरी चाल। सब कुछ हमसे अलग था। हम गाँव-कस्बों के सरकारी या हिंदी माध्यम के बच्चे थे, इसलिए शुरू में यह भिन्नता बहुत ज़्यादा महसूस होती थी। मानो उनके और हमारे बीच अदृश्य-सी दूरी खड़ी हो। वे शब्दों को बड़ी सहजता से जोड़ते थे, और हम कभी-कभी समानार्थी शब्द ढूँढते-ढूँढते ही वाक्य भूल जाते थे। वे किताबों से ज़्यादा दुनिया की बातें करते थे, और हम दुनिया से ज़्यादा किताबों में उलझे रहते थे। फिर भी धीरे-धीरे एक सच्चाई सामने आई की भावनाएँ किसी भाषा की मोहताज नहीं होतीं। कुछ ही दिनों में यह समझ आ गया कि बात चाहे किसी भी भाषा में निकले अगर दिल साफ़ हो, तो रास्ता अपने आप बन जाता है। धीरे-धीरे हम सबकी दूरी कम होने लगी। और दोपहर का लंच मिल बाट खाना आम बात हो गयी। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि भाषा सिर्फ एक माध्यम है, पर मन की गर्माहट, व्यवहार की विनम्रता, और भावनाओं की सच्येचाई-  सब किसी भी भाषा से ऊँचे होते हैं। और शायद इसी कारण, हमारे बीच की दूरियाँ ध्वनि से नहीं, संवेदना से मापी जाने लगीं.....।

विज्ञान वाला ग्रुप बनने के बाद, एक नई जिज्ञासा मन में जन्म लेने लगी थी। अब हम सिर्फ अपने विज्ञान-वर्ग तक सीमित नहीं थे बल्कि यह जानने की इच्छा भी उठने लगी कि दूसरे समूहों में कौन-कौन हैं, उनकी सोच कैसी है, उनका व्यवहार कैसा है, और किस तरह वे इस नए शहर और नए माहौल को अपनाते हैं। असली वजह शायद यही थी कि इंग्लिश की क्लास में हम सब एक साथ आते थे आर्ट्स, कॉमर्स, साइंस; पूरा स्कूल मानो एक मिश्रित धारा बन जाता था। कक्षा में कुछ चेहरे रोज़ दिखाई देते थे, कुछ आवाज़ें कानों को पहचान सी जाती थीं, और कुछ मुस्कानें अनजाने में ही मन पर छाप छोड़ जाती थीं। लेकिन जैसे ही इंग्लिश की घंटी खत्म होती, हम सब अपनी-अपनी राहों में बँट जाते और कोई अपने विषयों की अलग दुनिया में खो जाता।

उसी बिखराव ने एक बात स्पष्ट कर की हम एक ही विद्यालय के थे, पर हमारी कहानियाँ कितनी अलग थीं। और शायद इसी एहसास ने मेरे भीतर एक शांत-सी चाह पैदा की। दूसरों को समझने की,
उनके स्वभाव को जानने की, उनके संघर्ष और सरलताओं को देखने की। यह इच्छा किसी आकर्षण से नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ा और बड़ा दृष्टिकोण देने की आकांक्षा से आई थी। क्योंकि जब आप विभिन्न समूहों को देखते हो, उनकी बोलचाल, उनकी हँसी, उनके सपने, तो समझ आता है कि दुनिया कितनी विस्तृत है और आपका अनुभव कितनी छोटी जगह पर अटका हुआ था। और शायद पहली बार, मुझे यह एहसास हुआ कि स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं है; यह जीवन का वह चौक है जहाँ हर चेहरे के पीछे एक पूरी कहानी छिपी होती है, और हर कहानी आपको थोड़ा-थोड़ा बदल देती है।

आत्मध्याय 6                                                 आत्मध्याय 8