तब मुझे fir lagne lga ki samaj ki ye rudiwadi soch abhi bhi wahi khadi hai bs thoda sa rup badal gya hai . tb mujhe समझ आया कि हमारा समाज महिलाओं के स्वतंत्रता-गीत तो गाता है, पर उनकी उड़ानों पर अब भी अपने पुराने शक के धागे बाँधे रहता है।
उसकी बातें सुनकर मुझे एहसास हुआ कि मुझे जो बदलता हुआ समाज दिख रहा है, वह सिर्फ़ बाहर की सतह है। अंदर की सोच अभी भी उसी पुराने ढर्रे पर है, जहाँ लड़की का हर कदम सवालों में तौला जाता है और हर निर्णय पर निगाहें टिकी होती हैं।
मेरे लिए ये सब सुनना असहज करने वाला था क्योंकि मैं मान बैठा था कि सब कुछ ठीक हो चुका है।
पर उसके अनुभव बताते थे कि बदलाव अभी आधा भी पूरा नहीं हुआ है। और शायद इसी वजह से, हमारी बातों का वजन बढ़ता गया क्योंकि वह जितना अपनी दुनिया मेरे सामने खोलती थी, उतना ही मैं उसकी मजबूती, उसकी समझ और उसकी चुप्पियों को पहले से कहीं ज्यादा समझने का प्रयास करने लगा था।
उसका हर एक वाक्य मेरे भीतर ऐसे समा रहा था जैसे एक छोटे बच्चे को हर चीज जान जाने का उत्साह, उसके अंदर सवालों के झरने का रूप लेने लगती है ।
लेकिन मै अपने सवालों पर विराम चिन्ह लगाते हुए पढ़ाई करने लगा क्योकि अब नवंबर आ चुका था और बोर्ड परीक्षा का डर भी।
PADHAI KA DRR 49
अब तक 10वी मैने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की थी और सबसे कम मेरे नंबर अंग्रेजी मे ही थे और यहा तो सारे विषय का परीक्षा भी अंग्रेजी मे और ऊपर से मैने 12वी में साइंस के साथ गणित ले रखा था। इसका मतलब मुझे पढ़ाई से लापरवाही थोड़ा भी नही करना चाहिये था।
पर ये उम्र ऐसी है की मन अक्सर उस खाई की ओर बढ़ता है जिसमें पता भी होता है की, यह उज्जवल जीवन के लिए प्रतिरोधकता का करण बन सकता है।
ऊपर से धीरे-धीरे हमारी बातचीत नियमित होने लगी थी और जब कभी मैं उससे अपना कोई विचार साझा करता, चाहे वो समाज पर हो, रिश्तों पर, या भावनाओं पर-
वो जवाब में केवल सामान्य बातें नहीं कहती थी। कई बार लगता, मै भले ही उम्र मे ज्यादा हो सकता हु पर अनुभवों में उससे बहुत पीछे।वो दुनिया को जिस नजरिये से पढ़ लेती थी, जो दृष्टि साधारण इंसानों को नसीब नहीं होती। शायद यही कारण था कि वो मुझे हर दिन पहले से थोड़ी और अच्छी लगने लगी।
उधर परीक्षा नज़दीक थीं, सिलेबस अधूरा था, और मेरा मन- mano
काबू के पिंजरे में गिरफ्तार (ke rihai ke jid pr ada tha) करने की हर कोशिश को तोड़कर बाहर उड़ जाना चाह रहा था।
भावनाओं के इस उथल-पुथल को लेकर मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि पढ़ाई पर ध्यान दूँ या उसकी बातों में छिपे संसार को पर।
एक दिन मैंने उससे कुछ ऐसा पूछ लिया-
“तुम कैसी लड़की हो…?
मतलब… अपने बारे में क्या सोचती हो?”
उसने मेरी बात सुनी।
कुछ क्षण शांत रही।
फिर एक बहुत ही हल्की और आत्मविश्वास भरी आवाज़ में बोली-
“मैं तुम्हें बताऊँगी…लेकिन मुझे थोड़ा समय चाहिए, क्योकि खुद को जानना इतना आसान नही होता।”
वो कहती है की-
मैं अल्हड़ सी लड़की हूं, मामूली से ख्वाब है।
मचलता मन, दौड़ता दिमाग और सपने में हिसाब है।
कदम कहीं रुकते नहीं है, पत्थर पैर में चुभाते नहीं है,
जुबान डगमगाता नहीं है और ईमान मेरा चोट खाता नहीं है।
मैं सीधी नहीं हूं, मैं भोली नहीं हूं
और अपने कोई भी दिन में भूली नहीं हूं।
हक की लड़ाई लड़ना जानती हूं,
खुद की औरत से पहले इंसान मानती हूं।
मजाक और इज्जत में फर्क पहचानती हूं।
चुप रहना नहीं आता, अपमान सहना नहीं आता।
मुझे अपने मां की तरह रिश्तो में खुद को खोना नहीं आता।
मैं सम्मान और बराबरी को रिश्तो की एकमात्र निव मानती हूं,
मैं अल्हड़ सी लड़की हूं, अपना सर झुकाना भी जानती हूं और नजरें उठाना भी जानती हूं।

1 टिप्पणियाँ
Bhai rao mat tum abhi bhi prem ko nahi samjh rahe h.
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